मैं तुझसी तो नहीं
तू मुझसा भी नहीं
क्यों तुझ जैसी आज मैं लगती हूँ
सिर्फ होंठों से नहीं, पूरे बदन से हसती हूँ
आईने में झाँका तो तू था
किताब के पन्नो में भी
गाने के बोल में तू था
मेरी बेवजह बोली बातों में भी
क्या रूह में बस जाना इसे कहते हैं?
या इश्क़ का तेज़ बुखार चढ़ा है?
एक मुलाक़ात में ये हाल हुआ है
अगली बार फ़ना होने की दुआ है
तू मुझसा भी नहीं
क्यों तुझ जैसी आज मैं लगती हूँ
सिर्फ होंठों से नहीं, पूरे बदन से हसती हूँ
आईने में झाँका तो तू था
किताब के पन्नो में भी
गाने के बोल में तू था
मेरी बेवजह बोली बातों में भी
क्या रूह में बस जाना इसे कहते हैं?
या इश्क़ का तेज़ बुखार चढ़ा है?
एक मुलाक़ात में ये हाल हुआ है
अगली बार फ़ना होने की दुआ है
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