Sunday, December 3, 2017

मुलाक़ात

मैं तुझसी तो नहीं
तू मुझसा भी नहीं

क्यों तुझ जैसी आज मैं लगती हूँ
सिर्फ होंठों से नहीं, पूरे बदन से हसती हूँ

आईने में झाँका तो तू था
किताब के पन्नो में भी

गाने के बोल में तू था
मेरी बेवजह बोली बातों में भी

क्या रूह में बस जाना इसे कहते हैं?
या इश्क़ का तेज़ बुखार चढ़ा है?

एक मुलाक़ात में ये हाल हुआ है
अगली बार फ़ना होने की दुआ है 

दरवाज़ा

एक हलकी सी मुस्कान लबों पे खिल उठी
तेरे आने की आहट जब दरवाज़े पे आ रुकी

दरवाज़े के इस तरफ थी बेचैन सी सांसें
और उस तरफ keyhole से दिखती तेरी गहरी दो आँखें

मेरी धड़कन doorbell से तेज़ थी
तबियत बिगड़ रही थी बेचारे दिल की

कुछ देर और रोक लेती खुद को, तो तुम्हे लगता मैं घर पे नहीं हूँ
सोचा तीन साल बाद तुमसे रूबरू होने का मौका ऐसे ही जाने दूँ

पर रोक सकती बीमार दिल को तो क्या बात थी
दिल भी उतना मजबूर था जितनी मैं मगरूर थी

दिल जीता मैं हारी और खुल गया दरवाज़ा
दो feet की दूरी पे थे तुम, मेरी आँख में चुभा कुछ धुआं सा

आंसू मैंने बहने नहीं दिए, रोक के रक्खा उन्हें अपनी जगह
छलक के पूछना चाहती थी तुमसे सालों तक ना आने की वजह

तुम्हारे माथे की शिकंज तुम्हारा हाल बयान कर गयी
दिल से हारने के बाद आज मैं फिर खुद से हार गयी

जा रहे थे तुम मेरे हाथ में कागज़ का टुकड़ा थमाए
कुछ सीढ़ियों की दूरी को हम तैय नहीं कर पाए

दस मिनट में मैं शादीशुदा से तलाक़शुदा हो गई
एक दरवाज़ा खोलने का फैसला मेरी बाकी की ज़िन्दगी बन गई