Tuesday, September 22, 2015

गुलज़ार 


मैंने गुलज़ार को देखा नहीं है कभी
महसूस किया है बस

वो मेरे ज़हन में हैं
ज़िन्दगी में नहीं

मामूली सा दिन गुज़रता है मेरा
रात को नज़्म-ए-गुलज़ार का एक पेग लगा लेती हूँ; अब नशे की आदत हो चली है

रोज़-मर्राह की जगदोजहद में भूल जाती हूँ उन्हें
पर तन्हाई और रुस्वाई में गुलज़ार के बिना गुज़ारा नहीं होता

लफ्ज़ पिरोने की आदत नहीं है उन जैसी
बैरहाल बिज़नेस करती हूँ लफ़्ज़ों का, वो भी अंग्रेजी में emails के ज़रिये

झूठ कहते हैं गुलज़ार साहब
की "तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी हैरान हूँ मैं"

मेरी तो लम्बी लिस्ट है शिकायतों की
ज़िन्दगी को वक़्त हो तो अर्ज़ करूँ

एक बार उन्हें छूने का ना सही
उनके कुछ जूठे बर्तन हीं मांज लेती, यूँ कुछ शायरी मुझे में भी आ जाती

गुलज़ारिश रहेगी मेरी यह; तक़दीर, कायनात, किस्मत और खुदा से
राब्ता हो उनसे तो मुझे सांस आये..मुझे सांस आये..मुझे सांस आये..

Thursday, May 28, 2015

Hum Harjai

Mausam badalta hai
Aasmaan ka kya?

Hawa rukh mod leti hai
Ek sookhe patte ka kya?

Rishtey kho se jaate hain
Jazbaaton ka kya?

Izhaar-e-ishq karte hain log
Dard-e-mohabbat ka kya?

Waqt guzarta hai
Yaadon ka kya?

Woh kehta hai humari fitrat harjai si hai
Jo hum pe baras gaya, uss toofan ka kya?